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अभी कुछ समय से एक अजीब सा परिवर्तन मैं...अपने अंदर महसूस कर रहा हूँ किसी को भी चाहे ...अध्यापक , डॉक्टर , वकील और कल तो हद हो गई जब एक पहुचे हुए संत को सामने पाकर उनसे ही पूछ बैठा " धंदा कैसा चल रहा हैं "
मैं इतना मुर्ख भी नहीकी...एक अकेला इन्सान पत्थर से सोना ..आदि ..इत्यादि अर्थात आपकी सब समस्याओं को चुटकी बजा कर हल कर सकता है ..को यकीं कर लू पर ..मैं तो सिर्फ़ सिर्फ़ और सिर्फ़ वो गहराई देखना चाहता हूँ की... वह कहाँ तक गिर सकता है ...?
जब आपका दिल करे सामने वाले का वजन तोलकर बात करें ... और अपना उलू साधे जब आपका स्वार्थ सध जाए, आगे बद जाए फिर किसी और का वजन तोलकर बातों को आगे बदाये ....आगे बड़ते जाए ...बस इसी तरह दुनियादारी आ ही जायेगी ...