Saturday, December 18, 2010

आदर्श

कहाँ से ढूंडू
एक आदर्श तुम्हारे लिए मेरे बच्चो
अभी जब तुम अपने कपड़ों के बटन भी.....
मेरे बगेर नहीं लगा सकते
तब ....
जवान शीला, बदनाम मुन्नी को ढूँढ़ते-ढूँढ़ते
कहाँ पहुचेगी ... मैं नहीं जानता
और
जिनसे मैं आशा करता था
कि... करेंगे कुछ इन संबोधनों का
वो खुद ही कहीं 'आदर्श' तो कहीं 'राष्ट्रकुल' का बोझ अपने कमजोर कंधो पर लादे फिर रहें हें .......

1 comment:

Satish Saxena said...

शाबाश , कविवर !
बढ़िया लिख रहे हो यार !